पितृ पक्ष 2026: श्राद्ध की तिथियां, विधि, तर्पण और पितृ पक्ष की पूरी जानकारी
सनातन परंपरा में पितृ पक्ष 2026 का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह वह अवधि है जब लोग अपने पूर्वजों यानी पितरों का स्मरण करते हैं और श्रद्धा के साथ श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार की परंपराओं और पूर्वजों के प्रति सम्मान से जुड़ा समय भी माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों का स्मरण करते हैं, उनकी आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करते हैं।
अगर आप जानना चाहते हैं कि पितृ पक्ष 2026 कब से है, श्राद्ध की तिथियां कौन-सी हैं, तर्पण और पिंडदान कैसे किया जाता है, पितृ पक्ष में किन नियमों का पालन किया जाता है और सर्व पितृ अमावस्या 2026 कब है, तो यह लेख आपके लिए उपयोगी रहेगा। यहां पितृ पक्ष से जुड़ी प्रमुख तिथियों, धार्मिक मान्यताओं और सामान्य विधियों की जानकारी दी गई है।
पितृ पक्ष 2026 कब से कब तक है?
पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत रविवार, 27 सितंबर 2026 से होगी। इस दिन आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। पंचांगों में 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर पूर्णिमा श्राद्ध या स्नान-दान की तिथि दी गई है, जबकि पितृ पक्ष का मुख्य क्रम 27 सितंबर से शुरू होता है।
पितृ पक्ष का समापन शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को सर्व पितृ अमावस्या के साथ होगा। इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर किसी कारण से न किया जा सका हो।
इसके अगले दिन 11 अक्टूबर 2026 से शारदीय नवरात्रि का आरंभ होगा।
पितृ पक्ष 2026 की प्रमुख तिथियां
| तिथि | दिन | अवसर |
|---|---|---|
| 26 सितंबर 2026 | शनिवार | भाद्रपद पूर्णिमा / पूर्णिमा श्राद्ध |
| 27 सितंबर 2026 | रविवार | पितृ पक्ष प्रारंभ, प्रतिपदा श्राद्ध |
| 28 सितंबर 2026 | सोमवार | द्वितीया श्राद्ध |
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | तृतीया श्राद्ध |
| 30 सितंबर 2026 | बुधवार | चतुर्थी/पंचमी श्राद्ध |
| 1 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | षष्ठी श्राद्ध |
| 2 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | सप्तमी श्राद्ध |
| 3 अक्टूबर 2026 | शनिवार | अष्टमी श्राद्ध |
| 4 अक्टूबर 2026 | रविवार | नवमी श्राद्ध |
| 5 अक्टूबर 2026 | सोमवार | दशमी श्राद्ध |
| 6 अक्टूबर 2026 | मंगलवार | एकादशी श्राद्ध |
| 7 अक्टूबर 2026 | बुधवार | द्वादशी श्राद्ध |
| 8 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | त्रयोदशी श्राद्ध |
| 9 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | चतुर्दशी श्राद्ध |
| 10 अक्टूबर 2026 | शनिवार | सर्व पितृ अमावस्या |
नोट: श्राद्ध की तिथि और श्राद्ध कर्म का उपयुक्त समय स्थान के अनुसार बदल सकता है। इसलिए किसी विशेष शहर में श्राद्ध करने से पहले स्थानीय पंचांग या परिवार की परंपरा के अनुसार तिथि और मुहूर्त की पुष्टि करना उचित है।
▶️ Jaap Pro YouTube Channel देखें
पितृ पक्ष 2026 का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय माना गया है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत सदस्यों को याद करता है और उनकी शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा दान-पुण्य जैसे कर्म करता है।
पितृ पक्ष हमें यह भी याद दिलाता है कि परिवार और समाज की वर्तमान पीढ़ी अपने पूर्वजों से जुड़ी हुई है। इसलिए इस अवधि में श्रद्धा, संयम और सेवा भाव को विशेष महत्व दिया जाता है।

पितृ पक्ष 2026 में श्राद्ध कब करें?
परंपरा के अनुसार, किसी दिवंगत व्यक्ति का वार्षिक श्राद्ध सामान्यतः उसकी मृत्यु की तिथि यानी संबंधित तिथि पर किया जाता है। यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो या किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध न हो पाए, तो कई परंपराओं में सर्व पितृ अमावस्या को श्राद्ध करने का विधान बताया जाता है।
इसलिए केवल कैलेंडर की तारीख देखकर श्राद्ध तय करने के बजाय परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग को ध्यान में रखना चाहिए।
सर्व पितृ अमावस्या 2026 कब है?
सर्व पितृ अमावस्या 2026 शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को होगी। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है और इसे पितृ विसर्जन अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन सभी पितरों का स्मरण और श्राद्ध किया जाता है जिनकी निर्धारित श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया।
ध्यान दें: श्राद्ध और तर्पण की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में थोड़ी अलग हो सकती है। इसलिए महत्वपूर्ण कर्मकांड के लिए अपने कुलाचार और स्थानीय पंचांग का पालन करना उचित है।
गणेश चतुर्थी Ganesh chaturthi 2026: कब है, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और विसर्जन
पितृ पक्ष 2026 की प्रमुख श्राद्ध तिथियां और विशेष दिन
अष्टमी श्राद्ध – 3 अक्टूबर 2026
3 अक्टूबर 2026, शनिवार को अष्टमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। जिन पूर्वजों का निधन अष्टमी तिथि को हुआ हो, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है।
इस दिन कुछ क्षेत्रों में अन्य धार्मिक व्रत और पर्व भी पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। हालांकि, अलग-अलग पंचांगों और क्षेत्रों में व्रत की तिथि या धार्मिक मान्यताओं में अंतर हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि की पुष्टि करना उचित है।
नवमी श्राद्ध – मातृ नवमी
4 अक्टूबर 2026, रविवार को नवमी श्राद्ध होगा। पितृ पक्ष की नवमी तिथि को कई परिवारों में मातृ नवमी के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है।
परंपरा के अनुसार इस दिन परिवार की दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों और अन्य महिला पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। हालांकि, स्थानीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार इस दिन किए जाने वाले श्राद्ध के नियम अलग हो सकते हैं।
सर्व पितृ अमावस्या 2026 और पितृ विसर्जन
सर्व पितृ अमावस्या 2026 शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को होगी। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है और इसे पितृ विसर्जन अमावस्या भी कहा जाता है।
इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर किसी कारण से नहीं हो पाया। कई परिवार इस दिन अपने सभी पूर्वजों का सामूहिक रूप से स्मरण, तर्पण और श्राद्ध करते हैं।
पितृ पक्ष 2026 का धार्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की अवधि माना जाता है। इस दौरान परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे कर्म करता है।
धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में श्राद्ध कर्म को पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा से किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों की तृप्ति और परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।
इस दृष्टि से पितृ पक्ष 2026 केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का समय नहीं, बल्कि परिवार को अपनी पिछली पीढ़ियों और पारिवारिक परंपराओं से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण अवसर भी है।
पितृ ऋण की अवधारणा
सनातन परंपरा में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण की अवधारणा का उल्लेख मिलता है। पितृ ऋण को पूर्वजों के प्रति मनुष्य के कर्तव्य और कृतज्ञता से जोड़ा जाता है।
पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण जैसे कर्मों के माध्यम से लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। इसे पितृ ऋण के प्रति अपने कर्तव्य निभाने की धार्मिक परंपरा के रूप में समझा जाता है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पितृ पक्ष की परंपराएं
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पितृ पक्ष से जुड़ी परंपराओं और अनुष्ठानों में स्थानीय विविधता देखने को मिलती है। कई स्थानों पर इसे महालया पक्ष या श्राद्ध पक्ष जैसे नामों से भी जोड़ा जाता है।
बंगाल में महालया का विशेष सांस्कृतिक महत्व है और इसे दुर्गा पूजा के आगमन से जोड़ा जाता है। वहीं दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पितृ कर्मों के लिए स्थानीय परंपराओं और अलग-अलग नामों का प्रयोग किया जाता है।
इसलिए पितृ पक्ष से जुड़े किसी विशेष अनुष्ठान की जानकारी लेते समय अपने क्षेत्र, परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग को ध्यान में रखना चाहिए।
पितृ पक्ष 2026 श्राद्ध विधि: श्राद्ध कर्म कैसे करें?
Pitra Paksha 2026 Shradh Vidhi में श्रद्धा, शुद्धता और पारंपरिक नियमों का ध्यान रखा जाता है। श्राद्ध की विस्तृत विधि परिवार, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए विशेष कर्मकांड के लिए योग्य आचार्य या पंडित का मार्गदर्शन लेना उचित रहता है।
आज कई परिवारों में श्राद्ध कर्म करने वाले व्यक्ति को लेकर भी पारंपरिक व्यवस्था के साथ परिस्थितियों के अनुसार बदलाव देखने को मिलता है। इसलिए इसे केवल पुरुष या ज्येष्ठ पुत्र तक सीमित मानना उचित नहीं है; परिवार की परंपरा और धार्मिक मार्गदर्शन के अनुसार कर्म किया जा सकता है।
श्राद्ध के लिए आवश्यक सामग्री
श्राद्ध कर्म में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है:
- काले तिल
- कुशा
- जौ
- चावल
- गंगाजल या स्वच्छ जल
- दूध
- घी
- शहद
- फूल
- पिंड बनाने के लिए चावल या अन्य निर्धारित सामग्री
- पूजा के लिए स्वच्छ पात्र
- सात्विक भोजन
सामग्री की सूची अलग-अलग परंपराओं में बदल सकती है। इसलिए यदि परिवार में कोई निश्चित श्राद्ध विधि चली आ रही है, तो उसी के अनुसार सामग्री तैयार करना बेहतर होता है।
Box Office पर ‘हनुमान अंश’ का चमत्कार! फ्लॉप होते-होते ब्लॉकबस्टर बनी Neem Karoli Baba की बायोपिक
श्राद्ध कर्म की विधि: चरण दर चरण
1. स्नान और शुद्धता: श्राद्ध करने वाला व्यक्ति स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करता है और पूजा स्थल को साफ करता है।
2. संकल्प: संकल्प में श्राद्ध किए जाने वाले पूर्वज का नाम, गोत्र और आवश्यक विवरण लेकर श्राद्ध कर्म करने का संकल्प किया जाता है।
3. तर्पण: जल में तिल आदि का प्रयोग करके परंपरागत विधि से पितरों को तर्पण दिया जाता है।
4. पिंडदान: परिवार की परंपरा के अनुसार पिंड तैयार करके निर्धारित विधि से अर्पित किए जाते हैं।
5. भोजन और अर्पण: सात्विक भोजन तैयार करके परंपरा के अनुसार अर्पित किया जाता है।
6. दान-दक्षिणा: अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान और दक्षिणा दी जाती है।
7. प्रार्थना: अंत में पूर्वजों की शांति और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
नोट: कौआ, गाय, कुत्ते आदि को भोजन कराने की परंपरा कई परिवारों में प्रचलित है, लेकिन इसकी विधि और धार्मिक व्याख्या क्षेत्र एवं परिवार के अनुसार अलग हो सकती है।
श्राद्ध के लिए सही समय – अपराह्न काल
पारंपरिक श्राद्ध विधि में अपराह्न काल को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। कई पंचांगों में श्राद्ध के लिए कुतुप और रौहिण आदि मुहूर्तों का उल्लेख मिलता है।
हालांकि, श्राद्ध का वास्तविक मुहूर्त उस दिन की तिथि, सूर्योदय-सूर्यास्त और स्थान के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसलिए पितृ पक्ष 2026 श्राद्ध मुहूर्त के लिए केवल एक निश्चित समय जैसे दोपहर 1 से 3:30 बजे को सभी शहरों के लिए लागू नहीं मानना चाहिए।
महत्वपूर्ण: श्राद्ध और तर्पण के समय में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है। अपने स्थान के लिए स्थानीय पंचांग में दिए गए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को देखकर ही अंतिम समय तय करें।
पितृ तर्पण विधि 2026 – पितरों को तर्पण कैसे करें?
Pitra Tarpan Vidhi यानी पितृ तर्पण, श्राद्ध कर्म से जुड़ी महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में से एक है। इसमें श्रद्धा के साथ जल और परंपरा के अनुसार काले तिल अर्पित करके पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। “तर्पण” शब्द का संबंध तृप्ति और संतुष्टि की भावना से माना जाता है।
पितृ पक्ष के दौरान कई परिवार अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करते हैं। विशेष रूप से जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उस दिन किए जाने वाले श्राद्ध कर्म में तर्पण का विशेष स्थान माना जाता है। हालांकि, तर्पण की सही विधि, दिन और सामग्री परिवार की परंपरा तथा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकती है।
पितृ तर्पण के लिए आवश्यक सामग्री
- स्वच्छ जल
- काले तिल
- कुशा
- तांबे या अन्य स्वच्छ पात्र
- आसन
- परंपरा के अनुसार पुष्प या अन्य पूजा सामग्री
पितृ तर्पण की सामान्य विधि
1. स्नान और शुद्धता: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शांत स्थान पर आसन लगाएं।
2. संकल्प: अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्रद्धा से तर्पण करने का संकल्प लें। आवश्यकता के अनुसार पूर्वज का नाम और गोत्र लिया जाता है।
3. जल में तिल मिलाएं: स्वच्छ जल में काले तिल मिलाकर तर्पण के लिए तैयार करें।
4. कुशा का प्रयोग: परिवार की परंपरा और निर्धारित विधि के अनुसार कुशा का उपयोग किया जाता है।
5. तर्पण अर्पित करें: धार्मिक विधि के अनुसार जल को अर्पित करते हुए पितरों का स्मरण करें और उनकी शांति के लिए प्रार्थना करें।
6. प्रार्थना और समापन: तर्पण के बाद पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।
Pitra Paksha Rules – पितृ पक्ष में क्या करें और क्या न करें
Pitra Paksha Rules यानी पितृ पक्ष के नियमों में श्रद्धा, संयम, स्वच्छता और पूर्वजों के प्रति सम्मान को विशेष महत्व दिया जाता है। इस अवधि में परिवार अपनी परंपरा के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कर्म करता है।
पितृ पक्ष के दौरान कई परिवार मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा का पालन करते हैं। हालांकि, सभी नियम हर परिवार और क्षेत्र में समान नहीं होते। इसलिए महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यों के लिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का ध्यान रखना चाहिए।
पितृ पक्ष में क्या करें?
- स्नान करके स्वच्छता के साथ पितरों का स्मरण और तर्पण करें।
- श्राद्ध के दिन अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा और पितृ कर्म करें।
- सात्विक भोजन तैयार करें और श्रद्धा के साथ अर्पित करें।
- जरूरतमंद लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य वस्तुओं का दान करें।
- ब्राह्मण या योग्य व्यक्ति को भोजन और दक्षिणा देने की परंपरा हो तो उसका पालन करें।
- घर और पूजा स्थान की स्वच्छता बनाए रखें।
- श्राद्ध करते समय पूर्वजों का नाम और गोत्र याद करके श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।
- परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करें और घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखें।
- गाय, कौआ आदि को भोजन कराने की पारिवारिक परंपरा हो तो उसका पालन किया जा सकता है।
पितृ पक्ष में क्या न करें?
- श्राद्ध कर्म के दौरान अपशब्द, क्रोध और अनावश्यक विवाद से बचें।
- मांसाहार और मदिरा का सेवन न करने की परंपरा का पालन कई परिवार करते हैं।
- विवाह, गृह प्रवेश और अन्य बड़े मांगलिक कार्यक्रमों को इस अवधि में टालने की परंपरा कई परिवारों में है।
- पितरों के प्रति अनादर या उपेक्षा का भाव न रखें।
- श्राद्ध के दिन अपनी पारिवारिक धार्मिक परंपराओं की अनदेखी न करें।
- दिखावे के बजाय श्रद्धा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करें।
नोट: नए कपड़े, वाहन, घर खरीदना, बाल या नाखून कटवाना अथवा नया व्यवसाय शुरू करना जैसे विषयों पर अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग मान्यताएं मिलती हैं। इन्हें सार्वभौमिक धार्मिक निषेध मानने के बजाय अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्णय लेना उचित है।
पितृ दोष क्या है? धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता
पितृ दोष मुख्य रूप से ज्योतिषीय अवधारणा है, जिसे कुछ ज्योतिष परंपराओं में जन्म कुंडली में ग्रहों की विशेष स्थितियों से जोड़ा जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध, तर्पण और दान करने को कई लोग पितृ दोष से जुड़े धार्मिक उपायों के रूप में मानते हैं।
हालांकि, पितृ दोष को लेकर अलग-अलग ज्योतिषीय परंपराओं में व्याख्याएं भिन्न हो सकती हैं। इसलिए जीवन में होने वाली किसी समस्या को केवल पितृ दोष का परिणाम मानना उचित नहीं है।
पितृ दोष के बताए जाने वाले सामान्य संकेत
ज्योतिषीय मान्यताओं में परिवार में बार-बार आने वाली परेशानियों, विवाह या संतान से जुड़ी देरी, आर्थिक कठिनाइयों अथवा पारिवारिक तनाव जैसी स्थितियों को कभी-कभी पितृ दोष से जोड़ा जाता है। लेकिन ये स्थितियां अपने आप में पितृ दोष का निश्चित प्रमाण नहीं हैं।
यदि कोई व्यक्ति अपनी जन्म कुंडली के आधार पर पितृ दोष की जानकारी लेना चाहता है, तो किसी योग्य और विश्वसनीय ज्योतिष विशेषज्ञ से व्यक्तिगत कुंडली का विश्लेषण कराया जा सकता है।
पितृ दोष के लिए सामान्य धार्मिक उपाय
पितृ दोष से जुड़े धार्मिक उपायों में पितरों का श्राद्ध और तर्पण, पितृ पक्ष में दान-पुण्य, जरूरतमंदों को भोजन कराना तथा पूर्वजों की स्मृति में धार्मिक कार्य करना जैसी परंपराएं बताई जाती हैं।
इन उपायों को धार्मिक आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए। किसी भी पारिवारिक या व्यक्तिगत समस्या का समाधान केवल इन उपायों पर निर्भर न मानें।
पितृ तर्पण कहां किया जाता है?
पितृ तर्पण घर पर या किसी पवित्र नदी अथवा तीर्थस्थल पर किया जा सकता है, लेकिन इसकी विधि और स्थान को लेकर अलग-अलग परिवारों तथा क्षेत्रों में परंपराएं अलग हो सकती हैं। कुछ लोग पितृ कर्म के लिए विशेष तीर्थस्थलों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि कई परिवार घर पर ही पारंपरिक विधि से तर्पण करते हैं।
इसलिए यदि आपके परिवार में तर्पण की कोई निश्चित परंपरा चली आ रही है, तो उसी के अनुसार कर्म करना उचित माना जाता है।
पितृ तर्पण कब करें?
पितृ पक्ष में तर्पण का समय स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार निर्धारित किया जाता है। यदि किसी विशेष पूर्वज का श्राद्ध किया जा रहा है, तो उनकी मृत्यु तिथि से संबंधित श्राद्ध दिवस पर तर्पण किया जाता है। सर्व पितृ अमावस्या के दिन भी अनेक परिवार अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों का स्मरण करके तर्पण करते हैं।
महत्वपूर्ण: पितृ तर्पण की विस्तृत विधि में क्षेत्र, गोत्र परंपरा और धार्मिक संप्रदाय के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए पहली बार विधि करने वाले व्यक्ति के लिए किसी योग्य आचार्य या परिवार के जानकार व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना उचित रहेगा।

अगर आप रोज मंत्र जाप करने का लक्ष्य बना रहे हैं और जाप की संख्या को आसानी से track करना चाहते हैं, तो Jaap Pro Digital Jaap Counter को आजमा सकते हैं।
आप अपने पसंदीदा मंत्र का जाप करते हुए Digital Counter से counting रख सकते हैं और अपने daily chanting routine को व्यवस्थित कर सकते हैं।
आज ही अपने लिए एक सुविधाजनक समय तय करें, अपना मंत्र चुनें और जाप की एक छोटी-सी routine शुरू करें।
📲 Jaap Pro App Google Play Store से डाउनलोड करें
▶️ Jaap Pro YouTube Channel देखें
🙏 ॐ नमः शिवाय 🙏





