चीनी की कीमतें भारत दुनिया भर में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. भारत में चीनी की क़ीमतें पिछले दो महीनों में 40 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं.
चीनी कंपनियों के शेयरों में सोमवार के इंट्राडे कारोबार में 12 फ़ीसदी तक की तेज़ी आई. यह तेज़ी इस उम्मीद के बीच आई कि शुगर सेक्टर के आउटलुक में सुधार होगा.
बजाज हिंदुस्तान शुगर, अवध शुगर एंड एनर्जी, डालमिया भारत शुगर एंड इंडस्ट्रीज, धामपुर शुगर मिल्स, द्वारिकेश शुगर इंडस्ट्रीज, मगध शुगर एंड एनर्जी, मवाना शुगर्स, पोन्नी शुगर्स (ईरोड), उगर शुगर वर्क्स और उत्तम शुगर मिल्स के शेयरों ने इंट्राडे कारोबार में अपने-अपने 52 हफ़्ते के उच्चतम स्तर को छुआ.
भारत ने क़रीब एक दशक में पहली बार 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ़्री आयात की अनुमति दी है. यानी भारत विदेशों से चीनी बिना आयात शुल्क के मंगवा रहा है ताकि क़ीमतों को नियंत्रित रखा जाए.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ राज्यों में चीनी की क़ीमतों में बढ़ोतरी 50 फ़ीसदी तक पहुँच गई है. उत्तराखंड, पंजाब, मध्य प्रदेश और ओडिशा समेत आठ राज्यों में चीनी की क़ीमत 65 रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर पहुँच गई है.
23 अगस्त को ओडिशा में चीनी की क़ीमत सबसे ज़्यादा 67.4 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई. एक सप्ताह पहले यह 55 रुपये, एक महीने पहले 50.78 रुपये और 23 अगस्त, 2025 को 46.89 रुपये प्रति किलोग्राम थी.
भारत में चीनी लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील उत्पाद रही है, क्योंकि इसका असर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों पर पड़ता है.
पंजाब और उत्तर प्रदेश में अगले आठ महीनों के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में चीनी आयात करने के फ़ैसले ने भी राजनीतिक रंग ले लिया है.
सरकार क़ीमतें क्यों नहीं कंट्रोल कर पा रही है?
शुगर सेक्टर में एक संतुलन की बात अक्सर की जाती है. उपभोक्ता, किसान और मिल मालिक. उपभोक्ता चाहता है कि उसे सस्ती चीनी मिले, किसान चाहता है कि गन्ने की ऊंची क़ीमत उसे मिले और मिल मालिक चाहते हैं कि उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा हो.
अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार बताते हैं कि सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि इन तीनों (उपभोक्ता, किसान और मिल मालिक) के बीच संतुलन बनाए रखे लेकिन ऐसा इस बार होता नहीं दिख रहा है.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ”सरकार ने जो क़दम उठाए हैं, उनका असर अभी नहीं होगा क्योंकि स्थिति जब बेकाबू हो गई, तब क़दम उठाए गए हैं. सरकार ने चीनी का निर्यात क्यों होने दिया, इथेनॉल के लिए चीनी क्यों डायवर्ट की गई? इन सवालों के जवाब सरकार के पास नहीं हैं.”
केंद्र सरकार ने एक अगस्त से 30 नवंबर तक देशभर के चीनी डीलरों पर 400 टन की स्टॉक सीमा भी लागू की है. वहीं, एक सितंबर से थोक उपभोक्ताओं को 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी.
लेकिन प्रोफ़ेसर अरुण कुमार मानते हैं कि ”इसका असर तत्काल नहीं दिखेगा. क़ीमतें स्थिर होने में कम से कम दो महीने लग सकते हैं.

चीनी क्यों महंगी हो रही है?
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के अध्यक्ष नीरज शिरगांवकर ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बताया कि, “चीनी का स्टॉक और आपूर्ति पर्याप्त है और त्योहारों के दौरान बढ़ी हुई मांग को पूरा करने में कोई समस्या नहीं होगी.”
भारत में अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान चीनी की मांग आम तौर पर बढ़ जाती है. इस दौरान पारंपरिक मिठाइयों और कन्फेक्शनरी की खपत बढ़ती है.
शिरगांवकर ने कहा कि चीनी की कोई भी कमी कृत्रिम है और सट्टेबाजी के कारण पैदा हुई है. सरकार की ओर से 10 लाख टन चीनी के आयात की अनुमति जैसे क़दम बाज़ार में चिंता कम करने के मक़सद से उठाए गए हैं.
उन्होंने बताया कि 30 सितंबर को समाप्त होने वाले मार्केटिंग वर्ष में भारत ने 2.79 करोड़ टन चीनी का उत्पादन किया. यह सालाना 2.8 करोड़ से 2.85 करोड़ टन की खपत से थोड़ा कम है, लेकिन पिछले साल के 2.61 करोड़ टन उत्पादन से अधिक है.
उन्होंने कहा कि चीनी मिलों ने क़रीब 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया है और इस साल क़रीब आठ लाख टन चीनी का निर्यात किया गया है. सरकार ने कुल 20 लाख टन निर्यात की अनुमति दी थी.
उन्होंने बताया कि भारत नए मार्केटिंग वर्ष की शुरुआत क़रीब 35 लाख टन के शुरुआती स्टॉक के साथ करेगा, जो एक साल पहले के 50 लाख टन के मुक़ाबले कम है.
विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठा रही हैं लेकिन अभी तक सरकार को क़ीमतें नियंत्रित करने में कामयाबी नहीं मिली है.
विपक्ष इथेनॉल बनाने के लिए चीनी को डायवर्ट किए जाने को क़ीमतों में तेज़ बढ़ोतरी की वजह बता रहा है. वहीं, किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि त्योहारों के मौसम से पहले बड़े व्यापारियों ने चीनी की क़ीमतों में कृत्रिम बढ़ोतरी की है.
सरकार ने अपने जवाब में कहा कि वह स्थिति पर क़रीबी नज़र रख रही है. सरकार के मुताबिक़, चीनी की क़ीमतें बढ़ने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें घरेलू उत्पादन का अनुमान से कम रहना, त्योहारों से पहले मांग में बढ़ोतरी, मौसम के कारण गन्ने की फसल को नुक़सान, वैश्विक स्तर पर चीनी की आपूर्ति कम होने के साथ सट्टेबाज़ी और जमाखोरी शामिल हैं.
23 अगस्त, 2025 को देश भर में चीनी की औसत खुदरा क़ीमत 46.30 रुपये प्रति किलोग्राम थी. लेकिन 23 अगस्त, 2026 को यह बढ़कर 62.47 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई, यानी एक साल में 34.92 फीसदी की बढ़ोतरी.
इस साल 23 जुलाई को चीनी की कीमत 48.62 रुपये प्रति किलोग्राम थी. यानी केवल 30 दिनों में कीमत 28.49 फ़ीसदी बढ़ गई. 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक साल में चीनी की कीमत 40 से 50 फ़ीसदी तक बढ़ी है.

विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा
विपक्ष का आरोप है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के कारण चीनी की क़ीमतें बढ़ रही हैं. आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा कि गन्ने को इथेनॉल उत्पादन में डायवर्ट करने से चीनी का उत्पादन कम हुआ है, जिसके कारण केवल 17 दिनों में चीनी की क़ीमत 20 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गई.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ई20 नीति की तत्काल समीक्षा करने और उपभोक्ताओं के लिए बिना इथेनॉल मिला पेट्रोल उपलब्ध कराने की मांग की. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार के अहंकारी फ़ैसलों की क़ीमत लोगों को महंगे खाद्य पदार्थों और महंगे सफ़र, दोनों के रूप में चुकानी पड़ रही है
मंत्रालय ने कहा कि चीनी की क़ीमतों में हालिया बढ़ोतरी के लिए इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं है.
बयान में कहा गया, “यह कहना ग़लत है कि चीनी की हालिया क़ीमत बढ़ोतरी इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने की वजह से हुई है. वास्तव में, इथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में क़रीब 12 फ़ीसदी से घटकर 2025-26 में क़रीब नौ फ़ीसदी रह गया है. इसके अलावा, अब देश में उत्पादित इथेनॉल का क़रीब तीन-चौथाई हिस्सा अनाज, ख़ासकर मक्का से आता है.”

क्या मौसम और बीमारी की भी मार गन्ने पर पड़ी है?
इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) के लखनऊ स्थित संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ शुगरकेन रिसर्च के निदेशक एस एन सुशील ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि गन्ने का उत्पादन कम नहीं हुआ है बल्कि बढ़ा ही है.
एसएन सुशील ने कहा, ”भारत सरकार के तीसरे अनुमान के हिसाब से गन्ने का 500.06 मिलियन टन उत्पादन हुआ है. इसमें 287.25 मिलियन टन गन्ने की क्रशिंग हुई है. गन्ने का उत्पादन देखेंगे, तो अच्छा है.”
“अगर पिछले साल का एस्टिमेट देखें, तो वह 454.61 मिलियन टन था. इस साल 500 मिलियन टन है. गन्ने का उत्पादन पर्याप्त है, बल्कि यह ऑल टाइम रिकॉर्ड है. अगर आप इस्मा और एनसी कोऑपरेटिव फेडरेशन का प्रकाशित डेटा देखेंगे, तो उसके हिसाब से 287.24 मिलियन टन गन्ने की क्रशिंग हुई है. क्रशिंग का मतलब है कि गन्ने से चीनी बनाई गई.”
एसएन सुशील कहते हैं, ”भारत में चीनी की खपत बढ़ रही है. चीनी को लेकर थोड़ी जागरूकता की कमी है. मुझे लगता है कि इसीलिए भी खपत बढ़ी है. हमें चीनी ज़्यादा खाने की आदत है.
खासतौर पर इसी वजह से त्योहारों के समय मांग बढ़ती है. त्योहार में हर साल चीनी की मांग बढ़ती है और इसका असर क़ीमतों पर भी पड़ता है. इस सीज़न में किसानों और चीनी मिलों की उत्पादन लागत बढ़ी है. पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण डीजल और खाद की क़ीमतें बढ़ने से इसका असर इनपुट लागत पर पड़ा है.”
एसएन सुशील कहते हैं, ”गन्ने में रेड रॉट बीमारी की बात कही जा रही है. लेकिन रेड रॉट उतना बड़ा मुद्दा नहीं है. हमारी एक वैरायटी थी, 0238 जो 2015, 2016 और 2017 के बाद क़रीब 85 प्रतिशत क्षेत्र में उगाई जाने लगी थी. पिछले चार-पाँच साल में उसमें रेड रॉट आया. रेड रॉट
इसलिए आया, इसमें विज्ञान की विफलता नहीं है. पैथोजन का एक नया स्ट्रेन आ गया. उसका नया पैथोटाइप CF13 है. CF13 आने की वजह से वह वैरायटी रेड रॉट के लिए संवेदनशील हो गई. फिर उस वैरायटी को बदलने की बात आई.”
अब उस वैरायटी का उत्पादन हर जगह कम कर दिया गया है. वह अब सीड चेन में भी नहीं है. उत्तर प्रदेश में उसका रकबा 85 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत रह गया है. किसानों ने धीरे-धीरे उस वैरायटी को छोड़ दिया है. अब दूसरी नई वैरायटीज तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं. इसलिए उत्पादन अच्छा हो रहा है. दूसरी बात कमज़ोर मॉनसून को लेकर कही जा रही है लेकिन वो फसल तो अभी खेत में ही है. इसलिए इसके असर का आकलन अभी नहीं किया जा सकता है.
फिर महंगी हुई चीनी, एक ही दिन में बढ़ी कीमत; जानें अब कितना है रेट?
रक्षा बंधन और गणेश चतुर्थी के त्योहार से पहले चीनी की कीमतें कम होने का नाम ही नहीं ले रही है. कल मंगलवार को फिर से इसकी कीमत बढ़ी है, जिसने आम खरीदारों की टेंशन बढ़ा दी है.
त्योहारें जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही हैं, चीनी के दाम कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं, जिससे देश की आम जनता परेशान है. मंगलवार को खुदरा बाजार में चीनी की कीमतें लगभग एक रुपये बढ़कर करीब 64 रुपये प्रति किलोग्राम हो गईं. जबकि सोमवार को औसत कीमत 63.05 रुपये प्रति किलो थी.
धड़ाधड़ बढ़ती जा रहीं कीमतें
उपभोक्ता मामलों के विभाग (मूल्य निगरानी प्रभाग) के आंकड़ों के अनुसार, 25 अगस्त को चीनी का अखिल भारतीय औसत भाव 63.97 रुपये प्रति किलो था, जो एक महीने पहले के 48.81 रुपये प्रति किलो से 31% ज्यादा है. वहीं, पिछले साल अगस्त के मुकाबले कीमत 38% ज्यादा है. एक साल पहले इस दौरान चीनी 46.31 रुपये प्रति किलो के भाव पर उपलब्ध थी.
थोक रेट में आ रही कमी
आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को चीनी का थोक भाव 59.23 रुपये प्रति किलो था, जबकि एक महीने पहले यह 45.35 रुपये प्रति किलो और एक साल पहले 43.01 रुपये प्रति किलो था. इससे पहले सोमवार को खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने कहा कि चीनी के आयात की अनुमति देने और सट्टेबाजी व जमाखोरी पर रोक लगाने के सरकार के फैसले के बाद से चीनी का मिल भाव 18% घटकर 55 रुपये प्रति किलो पर आ गया है. पिछले सप्ताह चीनी का मिल भाव रिकॉर्ड 67 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया था.
सरकार ने क्या उठाए कदम?
आम जनता को राहत देने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के मकसद से सरकार ने कई बड़े फैसले लिए हैं जैसे कि बिना ड्यूटी चीनी के आयात को मंजूरी दी है. लंबे समय बाद सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन (10 LMT) कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त (Duty-Free) आयात को मंजूरी दी है ताकि देश में सप्लाई बढ़ाई जा सके.
साथ ही सरकार ने चीनी स्टॉक की लिमिट भी लागू की है. चीनी डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा तय की गई है. 1 सितंबर से बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं जैसे बेकरियों और हलवाइयों को 15 दिनों से अधिक की खपत का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी.
चीनी की जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त टीमें मिलों में जाकर चीनी के स्टॉक का भौतिक सत्यापन (Physical Verification)भी कर रही हैं.
अतिरिक्त स्टॉक की कमी में कैसे बदला?
चीनी के मौजूदा सीजन के आंकड़ों को देखें तो पूरी स्थिति आसानी से समझी जा सकती है। शुरुआत में देश में चीनी की जरूरत से ज्यादा उपलब्धता की उम्मीद थी, लेकिन बाद में उत्पादन के अनुमान लगातार कम होते गए।
नवंबर में इस्मा ने चीनी उत्पादन का अनुमान थोड़ा घटाकर 3.435 करोड़ टन कर दिया। इसमें से करीब 34 लाख टन चीनी इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने की उम्मीद थी। यानी खाने और घरेलू इस्तेमाल के लिए करीब 3.1 करोड़ टन चीनी बचने का अनुमान था।
सीजन की शुरुआत में देश के पास करीब 50 लाख टन चीनी का पुराना स्टॉक भी था। इसे जोड़ने पर कुल उपलब्ध चीनी करीब 3.6 करोड़ टन होने का अनुमान था। वहीं, देश में चीनी की घरेलू खपत करीब 2.85 करोड़ टन रहने की उम्मीद थी।
इस हिसाब से देश में जरूरत से काफी ज्यादा चीनी बचने की संभावना थी। इस्मा का अनुमान था कि इस अतिरिक्त स्टॉक में से कम से कम 20 लाख टन चीनी का निर्यात किया जा सकता है। लेकिन इसके बाद उत्पादन के अनुमान लगातार कम होते गए।
फरवरी में इस्मा ने चीनी के कुल उत्पादन का अनुमान और घटाकर 3.24 करोड़ टन कर दिया। यह पहले के अनुमान से करीब 30 लाख टन कम था। इतनी कमी देश की करीब एक महीने की चीनी खपत के बराबर है।
इसी के साथ इस्मा ने खाने और घरेलू इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होने वाली शुद्ध चीनी का अनुमान भी घटाकर 2.93 करोड़ टन कर दिया। संस्था के मुताबिक, करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने की उम्मीद थी। इस तरह कुछ ही महीनों में चीनी के अतिरिक्त स्टॉक का अनुमान काफी कम हो गया और बाजार में भविष्य में कमी की चिंता बढ़ने लगी।
अप्रैल में चीनी के कुल उत्पादन का अनुमान एक बार फिर घटाकर 3.2 करोड़ टन कर दिया गया। अब सरकार 2025-26 के पूरे सीजन में देश में करीब 3.06 करोड़ टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान लगा रही है। इसमें से करीब 29 लाख टन चीनी
इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने की उम्मीद है। इसके अलावा करीब 8 लाख टन चीनी का निर्यात भी किया जा चुका है। इन दोनों को घटाने के बाद देश में घरेलू इस्तेमाल के लिए करीब 2.69 करोड़ टन चीनी बचेगी। यह मात्रा देश की अनुमानित 2.85 करोड़ टन खपत से करीब 16 लाख टन कम है।
हालांकि, पिछले सीजन से बचा हुआ चीनी का स्टॉक इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकता है। यानी सीजन की शुरुआत में मौजूद पुराना स्टॉक अभी भी देश में चीनी की कुल उपलब्धता बढ़ाने में मदद करेगा। इस बीच, अप्रैल के अनुमान से काफी पहले ही एक दूसरी चीनी संस्था ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (एआईएसटीए) ने उत्पादन को लेकर चिंता जताई थी।
मार्च के पहले हफ्ते में एआईएसटीए ने 2025-26 सीजन के लिए शुद्ध चीनी उत्पादन का अनुमान घटाकर 2.83 करोड़ टन कर दिया था। इस आंकड़े में इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी को शामिल नहीं किया गया था। संस्था ने बताया कि देश के दो बड़े चीनी उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने की पैदावार कम रहने की वजह से उत्पादन का अनुमान घटाना पड़ा।
इथेनॉल का कितना असर?
चीनी की मौजूदा स्थिति को समझने में इथेनॉल नीति की बड़ी भूमिका है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि गन्ने से बनने वाली चीनी में से कितनी मात्रा बाजार में खाने के लिए उपलब्ध रहेगी और कितनी इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होगी।
2025-26 के चीनी सीजन की शुरुआत में उम्मीद थी कि इथेनॉल बनाने के लिए इस बार बड़ी मात्रा में चीनी का इस्तेमाल किया जाएगा। चीनी उद्योग का अनुमान था कि करीब 45 से 50 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो सकती है।
लेकिन तेल कंपनियों ने 2025-26 के इथेनॉल सप्लाई वर्ष के लिए चीनी से बने कच्चे माल से सिर्फ 290 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने का आवंटन किया। इसका मतलब था कि इथेनॉल बनाने के लिए चीनी की खपत शुरुआती अनुमान से काफी कम रह सकती है।
इस्मा ने पहले अनुमान लगाया था कि इथेनॉल बनाने में करीब 32 से 34 लाख टन चीनी इस्तेमाल होगी। अब यह अनुमान करीब 30 लाख टन का है। यानी शुरुआत में जितनी चीनी इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने की उम्मीद थी, उससे कम चीनी वास्तव में इस काम में गई।
आमतौर पर इसका मतलब यह होना चाहिए कि इथेनॉल में कम चीनी इस्तेमाल होने से घरेलू बाजार के लिए ज्यादा चीनी उपलब्ध होनी चाहिए। लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग रही। जैसे-जैसे चीनी उत्पादन के अनुमान घटते गए,
इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली कम मात्रा भी बाजार पर दबाव डालने लगी। यानी उत्पादन में आई बड़ी कमी के सामने इथेनॉल के लिए बचाई गई चीनी भी ज्यादा महसूस होने लगी। यही वजह है कि इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल कम होने के बावजूद घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ती गई।
सरकार का कहना है कि चीनी की कीमतों में हुई तेज बढ़ोतरी की वजह इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल नहीं है। सरकार ने 21 अगस्त को जारी बयान में कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के पीछे कई दूसरी वजहें हैं। इनमें उम्मीद से कम चीनी उत्पादन, त्योहारों के दौरान बढ़ी मांग, खराब मौसम से फसल को नुकसान, दुनिया भर में चीनी की आपूर्ति की स्थिति और बाजार में कारोबार का तरीका शामिल हैं।
सरकार के मुताबिक, इसे इथेनॉल बनाने के लिए चीनी के इस्तेमाल से जोड़ना सही नहीं है। सरकार ने बताया कि इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर करीब 9 फीसदी रह गया है।

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